
मैं जो करता हूँ वे सामाजिक मान्यताओं के आधार होते हैं ,
जो मैं सोचता हूँ वे मेरे उन्मुक्त विचार होते हैं |
सामाजिक आधारों से बेशक सफल इंसान बनते हैं , पर ,
उन्मुक्त विचारों से नए समाज पनपते हैं |
छाते का साया तुम्हे सिर्फ भीगने से बचाएगा , पर ,
बाढ़ का पानी सर से नहीं पैरों से डूबाएगा|
शीर्ष पर तो फिर भी पहुंचा जा सकता है , पर ,
उखड़े पैरों को वापस जमाना महंगा पड़ सकता है |
पर सभी तो शीर्ष की ओर ही भाग रहे हैं ,
अपने पाँव ज़मीन से उखाड़ रहे हैं |\
फिर क्यूँ मैं सामजिक आधारों को मापदंड मानू
क्यूँ ना "उन्मुक्त विचारों" से एक नया समाज सुधारूं |
