UNMUKT

main aap sab ka swagat karta huun apne us pehlu ko aap se bantne ke liye jo barson se sabhi ke liye anjaan tha. mere nazdiki mere mitra aur meri ma shrimati SUDHA CHAUHAN ke kehne par hi main aap se rubaru ho raha hun aur yeh asha karta huun aap ise zarur sarahenge.

dhanyavaad

17 February, 2011

उन्मुक्त विचार


मैं जो करता हूँ वे सामाजिक मान्यताओं के आधार होते हैं ,
जो
मैं सोचता हूँ वे मेरे उन्मुक्त विचार होते हैं |

सामाजिक
आधारों से बेशक सफल इंसान बनते हैं , पर ,
उन्मुक्त
विचारों से नए समाज पनपते हैं |

छाते
का साया तुम्हे सिर्फ भीगने से बचाएगा , पर ,
बाढ़
का पानी सर से नहीं पैरों से डूबाएगा|

शीर्ष
पर तो फिर भी पहुंचा जा सकता है , पर ,
उखड़े
पैरों को वापस जमाना महंगा पड़ सकता है |

पर
सभी तो शीर्ष की ओर ही भाग रहे हैं ,
अपने
पाँव ज़मीन से उखाड़ रहे हैं |\

फिर
क्यूँ मैं सामजिक आधारों को मापदंड मानू
क्यूँ
ना "उन्मुक्त विचारों" से एक नया समाज सुधारूं |

एक रात भी न ऐसी


एक रात भी ऐसी जब तुम्हे मन से मिटाता ,
एक भी वो पहर जब याद कर नयनों को भीगता |

वास्ता मुझे भले ही देती , तुम्हारी हो प्रतिज्ञा ,
पर मैं कैसे तुमको , अपने ह्रदय से यूँ भूलता या मिटाता |

दोष जब फेंका गया हो जब की किसी ओर से भी ,
क्या यह फिर कायरता होगी , सूक्ष्म ह्रदय की गति को दबाना |

कर्त्तव्य मैंने यूँ निभाया , चुपचाप अपना पथ बदलकर ,
मन तेरा तब भी डोला क्या मेरी यह आह सुनकर |

अब विवश हूँ मैं की मुझको ओर भी हैं ऋण् चुकाने ,
या की ऐसे दाग भी हैं , कर्मों से अपने जो मिटने |

चांदनी छटने लगी है , चाँद यह कहीं छुप जाये ,
अंतराग्नि मेरे ह्रदय की अब कभी बुझने पाए |

प्रेम छंद कई गा चूका हूँ , अब गुनगुनाने पाउँगा मैं ,
कर्म ही स्वामी मेरा अब , इसे तजने पाउँगा मैं |

एक रात भी ऐसी जब तुम्हे मन से मिटाता ,
एक भी वो पहर जब याद कर नयनों को भीगता