
एक रात भी न ऐसी जब तुम्हे मन से मिटाता ,
एक भी न वो पहर जब याद कर नयनों को भीगता |
वास्ता मुझे भले ही देती , तुम्हारी हो प्रतिज्ञा ,
पर मैं कैसे तुमको , अपने ह्रदय से यूँ भूलता या मिटाता |
दोष जब न फेंका गया हो जब की किसी ओर से भी ,
क्या यह फिर कायरता न होगी , सूक्ष्म ह्रदय की गति को दबाना |
कर्त्तव्य मैंने यूँ निभाया , चुपचाप अपना पथ बदलकर ,
मन तेरा तब भी न डोला क्या मेरी यह आह सुनकर |
अब विवश हूँ मैं की मुझको ओर भी हैं ऋण् चुकाने ,
या की ऐसे दाग भी हैं , कर्मों से अपने जो मिटने |
चांदनी छटने लगी है , चाँद यह कहीं छुप न जाये ,
अंतराग्नि मेरे ह्रदय की अब कभी बुझने न पाए |
प्रेम छंद कई गा चूका हूँ , अब न गुनगुनाने पाउँगा मैं ,
कर्म ही स्वामी मेरा अब , इसे न तजने पाउँगा मैं |
एक रात भी न ऐसी जब तुम्हे मन से मिटाता ,
एक भी न वो पहर जब याद कर नयनों को भीगता
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