
चलो आज फिर लौट कर कुछ दूर तो साथ चलें ,छूट गए जो वक़्त की रेत में सुहाने पल उन्हें याद करें |
वक़्त सितम नहीं ढाता वो तो नादान है ,
अपनी ही भूलों को चलो आज फिर याद करें |
न तू ज़ालिम न में ही गुनाहगार ,
आज चलो हम फिर से उन टूटे सपनों के तार बुने |
अगली सुबह की भोर का एक भय भी है उत्साह भी ,
पर तू साथ चले तो बात बने , कुछ गहरे जख्मों के घाव भरें |
सूरज ढल रहा है अँधेरा बस होने ही को है ,
रात से पहले बस फिर एक बार इक दूजे का जी भर दीदार करें .
चलो आज फिर लौट कर कुछ दूर फिर साथ चलें ......
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